श्रीलंका में राजपक्षे की नियुक्ति का निर्णय उच्चतम न्यायालय ने निलंबित किया।

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श्रीलंका में हो रही राजनैतिक उथलपुथल ने एक नया मोड़ लिया है, राष्ट्रपति सिरीसेना ने अपने निर्णय द्वारा महिंद्रा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था, इस निर्णय को वहां के उच्चतम न्यायालय ने निलंबित कर दिया है तथा राष्ट्रपति की ओर से करवाई जा रही चुनावों की तैयारी को भी रोक दिया गया है।

पिछले माह २६ अक्तूबर को श्रीलंका के राष्ट्रपति सिरीसेना ने रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से हटाकर महिंदा राजपक्षे को नियुक्त कर दिया था, और नये चुनाव की तैयारी आरंभ करने को कहा था। नये चुनावों के लिये ५ जनवरी की तिथि को चुना गया था लेकिन उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस नलिन परेरा की अध्यक्षता में तीन जजों की बेंच ने इस पर सुनवाई करते हुए निर्णय सुनाया और कहा कि राष्ट्रपति द्वारा लिये गये निर्णय अनुचित थे, जिन पर रोक लगायी जाती है, और साथ ही नये चुनावों की तैयारी को भी रोकने को कहा।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने प्रसन्नता जाहिर की और ट्विटर पर कहा कि ‘जनता को पहली जीत मिली है, अभी हमें और आगे बढना है और देश में लोगों को एक बार फिर से संप्रभुता की बहाली करनी है’।

श्रीलंका के महिंदा राजपक्षे का झुकाव चीन की ओर है, जबकि रानिल विक्रमसिंघे भारत के प्रति मित्रता रखते हैं। सिरीसेना के निर्णय से भारत को झटका लगा था क्योंकि राजपक्षे की नियुक्ति से श्रीलंका एक बार पुनः चीन के हित वाली नीतियों और निर्णयों पर अमल करता।

भारत के पड़ोसी देशों पर चीन मित्रता पूर्वक विकास योजनाओं के बहाने से ऋण देकर उन पर अपना शिकंजा कस रहा है, पाकिस्तान, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका जैसे पड़ोसियों पर चीन अपनी गतिविधियां विकास योजनाओं के बहाने बढा रहा है। पाकिस्तान चीन के तथाकथित विकास और आर्थिक उन्नति के दिखाये सपनों के जाल में फंसकर अपने को परोक्ष रूप से चीनी नियंत्रण में दे चुका है। ऐसे में श्रीलंका में भी चीनी हित को साधने वाले व्यक्ति के प्रधानमंत्री बन जाने पर भारत की चिंता स्वाभाविक थी, किंतु वहां के उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय से वहां यह स्थिति अब बदल गयी है। राजपक्षे पर एल.टी.टी.ई के विरुद्ध कार्रवाई की आड़ में मानवाधिकार उल्लंघन और नरसंहार के आरोप लगाये जाते रहे हैं, इसके अतिरिक्त उन्होंने चीन से ढांचागत विकास के नाम पर श्रीलंका को करोड़ों डॉलर के ऋण के बोझ के नीचे दबा दिया है।


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