नवाडीह झारखंड में उज्ज्वला योजना से जंगल भी हरे भरे हुए।


इस बार जंगल गया… फ़ोटो और वीडियो सब देखे होंगे आप सब.. बकरी सब हैं लेकिन उनके खोराखी के लिए ज्यादा अंदर नहीं जाना पड़ता जंगल में पिछले कुछेक वर्षों से (नोट वाली बात है कुछेक वर्षों से) … हम आज से 17-18 साल पहले जब पैदल ही जंगल जाते थे तो बहुत अंदर जाते थे तब जा के बकरी के खाने लायक पाल्हा मिलता था और अपने लाइक भी कुछ खाने की चीजें।

आज की तारीख में उधर का आवागमन बहुत कम हो गया है। अब सबसे सामने वाले जंगल में ही बहुत कुछ अवेलेबल हो जाता है और बहुत घना भी है। जी बहुत घना।.. ज्यादा दिन नहीं यही कोई 3-4 साल पहले.. और हमलोग भी जब(17-18 साल पहले) पाल्हा और लकड़ी ढोते थे उस टाइम जंगल का दोहन देख कर लगता था कि ये जंगल आने वाले कुछ वर्षों में बिल्कुल ही समाप्त हो जायेंगे.. हरे-भरे कुछ न बचेंगे.. गाछ-वृक्ष विहीन.. बचेंगे तो केवल पत्थर भरे पहाड़ी.. मुंडन किये हुए पहाड़ी.. दूर से ही सब कुछ नजर आ जाएंगे.. और ये देख भी चुके थे.. सबसे सामने वाला जंगल (लम्बकी पहरी) एकदम से उजाड़ नज़र आने लगा था। .. लम्बकी पहरी का हालत देख के हमलोग कहते थे कि यही हाल रहा तो कुछ दिन बस-पहरी (सबसे घना वाला) का भी यही हाल होगा।

अभी का ऐसा मौसम है कि लकड़ी का सबसे ज्यादा कटाई होता है।.. दिसम्बर से लेकर फरवरी-मार्च तक। इस दौरान आपको सर पर लकड़ियों का बोझा लिए महिलाएं एक साथ बीस-पचीस एकदम से लाइन में दिख जाएंगी.. एकदम से ट्रेन की भांति गांव-टाँड़ की पगडंडियों में लकड़ी ढोते हुए।.. दिन भर बस एक ही काम खाना-पीना और लकड़ी ढोना। पूरे साल भर का स्टॉक बस इन्हीं 2-3 महीने में कर लेना है।.. चूंकि अभी धान काटना मेसना हो गया है और इनके सिझाने के अलावे कोई बड़ा काम रहता नहीं है, तो इनके सिझाने और साल भर का लकड़ी का स्टॉक भी इन्हीं महीनों के दौरान कर लिया जाता है। अगर सास लकड़ी लाने जंगल गई तो पूतोह लोकने के लिए आधे रास्ते में जाएगी एंड वाइस वर्सा।.. मार्च तक आते-आते पतझड़ भी शुरू और इस दरम्यान तक जंगल का इतना दोहन हो चुका होता है कि जैसे वस्त्र विहीन शरीर। एकदम से उजाड़ जंगल.. सफाचट।
और यही देख के कहते थे सब ‘पता नहीं ये बचे हुए जंगल और कितने दिन ??’

लेकिन इस बार जब जंगल गया तो बहुत कुछ बदला हुआ सा नजर आया।… न वो महिलाओं के ट्रेन नज़र आये और न जंगल उजाड़ से लगे।.. जहाँ जंगल घुसते ही टांगियों की आवाज गूँजती थी वहाँ अब बिल्कुल शांत सा लगा.. आवाज आ रही थी तो केवल मोर,मुर्गे और तमाम पंक्षियों और कीटों के।.. जंगल घुसते-घुसते कितने ही जन हाथ में टांगी लिए जंगल जाते भेंटा जाते थे और कितने ही जन हमारे जाते-जाते मुंडी और कांधे में पाल्हा/लकड़ी का बोझा लिए जंगल से आते हुए भेंटा जाते थे। लेकिन ये लोग नगण्य से नजर आए। न जाने वक़्त कोई भेंटाया और न आते वक्त।

जंगल भी हम सबसे घने वाले इलाके की तरफ गए… हमें वही जंगल मिला जिसे हम 17-18 साल पहले छोड़े थे, जिसकी हम चिंता करते थे कि ये भी कुछ वर्षों में लम्बकी पहरी बन जायेगा।.. एकदम हरा-भरा और घना।… सामने का लम्बकी पहरी भी बहुत घना था। और सूखी लकड़ियों से भरपूर।.. अगर कोई धान सिझाने के लिए लकड़ी भी लाने की सोचे तो सामने के पहाड़ियों में ही इतनी लकड़ी मिल जाये कि उसे मेन जंगल घुसने की कोई जरूरत ही नहीं।. वैसे भी जंगल के लकड़ियों का सबसे ज्यादा दोहन घरेलू चूल्हे में होता है.. हाँ खाना पकाने हेतु ही।

लेकिन ये जंगल घने क्यों हुए ?? हरे-भरे क्यों हुए ?? लकड़ियों पे डिपेंडेंसी कम क्यों हुई ??
कारण ??
कारण घर-घर गैस सिलेंडर और चूल्हे का आना। .. जी सिलेंडर चूल्हे का आना।.. और ये जितने भी चूल्हे आये हैं ये सभी ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के अंतर्गत ही आये हैं।.. दोनों बहनों के घर गया तो घर में गैस सिलेंडर रखे हुए थे। पहले जहां जाते ही पूरा अंगना लकड़ी के धुंवे से भर जाता था और उन लकड़ियों के धुंवों के छंटते-छंटते गर्म चाय हाथ में दीदी/बहन ला के देती थी वो धुँवा अब बिल्कुल गायब था।.. लकड़ी के मचान भी बहुत कम थे।.. इस बार देखे कि हमरे घर में भी उज्ज्वला योजना का एक गैस सिलेंडर और चूल्हा रखा हुआ है 😊 !

इसी तरह बहुतों के घर अब गैस सिलेंडर और चूल्हा फैमिलियर हो चुका है जिसे पहले किसी एटम बम से कम नहीं देखते थे। उज्ज्वला योजना का दूसरा पहलू ये भी है। घोर से घनघोर विरोधी भी इस चेंज को नकार नहीं सकता। आप स्वयं उन जंगलों का अवलोकन कर सकते है जहाँ से पहले लकड़ी ढुलाई का काम होता था।

इस पोस्ट के चलते मुझे पार्टी विशेष से जोड़ के कमिया मजदूर का तमगा न दे बैठे लोग।.. 😊 लेकिन जो सकारात्मक चेंजेस हुए हैं उन्हें लिखना कोई पार्टी पोलिटक्स नहीं।

यह पोस्ट फेसबुक उपयोगकर्ता गंगा मेहतो जी की वॉल से ली गयी है, जिसे यहां क्लिक कर के देख सकते हैं।

(सोशल मीडिया पर विभिन्न उपयोगकर्ता अपने क्षेत्रों के सकारात्मक समाचार लिखते रहते हैं, हमारा प्रयास है कि इन उपयोगकर्ताओं के माध्यम से देश के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों के बारे में आपको बताते रहें, क्योंकि यह सूचना सीधा प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा दी जाती है, इसलिये इसकी सत्यता अधिक रहती है)


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